दुनाली बंदूक की एक खराब नाली ने जिसे बनाया अचूक निशानेबाज
(लेखक: हेमंत चौकियाल, रूद्रप्रयाग, उत्तराखंड)
जिम कॉर्बेट उन चुनिंदा विदेशी मूल के भारतीयों में से एक हैं जिन्होंने भारत में रहकर भारतीयों से अपार प्यार, सम्मान और अपनत्व पाया। ब्रिटिश शासन के दौरान उत्तराखंड के विकट पहाड़ों पर आए गोरे नुमाइंदों में से कॉर्बेट ऐसे व्यक्तित्व थे, जिन्हें यहाँ की सादगी और संस्कृति ने गहराई तक प्रभावित किया। वे अपनी सरकारी रपटों में भी 'हमारा उत्तराखंड' लिखा करते थे।
🔹 शुरुआती जीवन और एक खराब नाली का जादू
एडवर्ड जेम्स कॉर्बेट (जिम कॉर्बेट) का जन्म 25 जुलाई 1875 को नैनीताल के कालाढुंगी में हुआ था। जब वे 4 वर्ष के थे, तब उनके पिता का देहांत हो गया। 13 भाई-बहनों के परिवार में जिम 11वें नंबर पर थे।
अचूक निशानेबाज बनने का रहस्य: 8 वर्ष की उम्र में जिम को एक रिश्तेदार से पुरानी भरतल दुनाली बंदूक मिली, जिसकी एक नाली फटी हुई थी। घर की आर्थिक तंगी के कारण जिम ने यह नियम बनाया कि उनकी चलाई हर एक गोली परिवार के भरण-पोषण के लिए कम से कम एक शिकार अवश्य लाए। सीमित गोलियों की इसी मजबूरी ने उन्हें बेहद धैर्यवान और अचूक निशानेबाज बनाया।
एक बार स्कूली बटालियन के निरीक्षण के दौरान एक सैन्य अधिकारी ने उनकी राइफल की साइट (Sight) ठीक करते हुए कहा था—"अब आराम से, तसल्ली से निशाना लगाओ।" इस बात को उन्होंने जीवनभर याद रखा और बाद में आदमखोरों का शिकार करते समय उन्हें कभी दूसरी गोली की जरूरत नहीं पड़ी।
🔹 मोकामाघाट में 21 साल और दरियादिली के किस्से
18 वर्ष की उम्र में रेलवे की नौकरी मिलने पर वे मोकामाघाट (बिहार) गए। वहाँ उन्होंने 21 वर्षों तक काम किया। कॉर्बेट जितने बड़े निशानेबाज थे, उतने ही बड़े दिलदार इंसान भी थे:
- मजदूर बुद्धू का कर्ज चुकाया: अपने मजदूर बुद्धू की 3 पीढ़ियों से चली आ रही साहूकार की 2 रुपये की उधारी (जो ब्याज से 130 रु बन चुकी थी) को वैधानिक कार्रवाई करते हुए 215 रुपये खर्च कर सदा के लिए खत्म कराया।
- मित्र मोती के लिए पक्का मकान: कालाढुंगी में अपने मित्र मोती के लिए 3 कमरों और चौड़े बरामदे वाला पक्का घर बनवाया।
- खेती की सुरक्षा के लिए दीवार: ग्रामीणों की फसलों को जंगली जानवरों से बचाने के लिए बोअर नदी के पास 3 मील लंबी और 6 फीट ऊंची पक्की दीवार बनवाई, जिसे बनने में 10 साल लगे।
🔹 33 आदमखोरों का अंत और रूद्रप्रयाग का खौफनाक तेंदुआ
1907 से 1938 के बीच जिम कॉर्बेट ने 19 आदमखोर बाघों और 14 आदमखोर तेंदुओं (कुल 33 आदमखोरों) को मारा।
| आदमखोर / स्थान | मौतों की संख्या | विशेष विवरण |
|---|---|---|
| चम्पावत की बाघिन (1907) | 436 लोग | जिम कॉर्बेट का पहला शिकार। |
| रूद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ (1926) | 125+ लोग | 1925 में ब्रिटिश पार्लियामेंट में प्रस्ताव पास हुआ। 1 मई 1926 को गुलाबराय में मारा गया। |
| ठाकुरद्वारा (थाक) का बाघ (1938) | — | कॉर्बेट का अंतिम शिकार। इसके बाद बंदूक त्याग दी। |
🔹 बंदूक छोड़ी, कैमरा उठाया: भारत का पहला नेशनल पार्क
जंगलों की अंधाधुंध कटाई और बाघों की घटती संख्या देखकर कॉर्बेट का हृदय परिवर्तन हो गया। उन्होंने शिकार छोड़कर वन्यजीव संरक्षण और फोटोग्राफी को अपना लक्ष्य बनाया।
- हेली नेशनल पार्क (1936): भारत के पहले राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाई, जिसका नाम 1957 में बदलकर 'जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क' रखा गया।
- वैज्ञानिक सम्मान: इंडो-चाइनीज बाघ की उप-प्रजाति का वैज्ञानिक नाम उनके सम्मान में Panthera tigris corbetti रखा गया।
- प्रसिद्ध पुस्तकें: उन्होंने Man-Eaters of Kumaon, Man-Eaters of Rudraprayag, और My India जैसी कालजयी पुस्तकें लिखीं।
स्वतंत्रता के बाद वे अपनी बहन मैगी के साथ केन्या चले गए, जहाँ 19 अप्रैल 1955 को 79 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।
स्थानीय स्मृति: रूद्रप्रयाग में जहाँ उन्होंने आदमखोर तेंदुए को मारा था, वहाँ अब संग्रहालय है। रूद्रप्रयाग की संस्था 'कलश' वर्ष 2006 से हर साल 25 जुलाई को कॉर्बेट जयंती का आयोजन करती है।

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