उत्तराखंड की अनोखी और ऐतिहासिक 'देवीधुरा बग्वाल 2026': फल-फूलों की अनोखी बग्वाल, जानिए परंपरा, मान्यता और पूरा इतिहास।



उत्तराखंड के चंपावत जिले में स्थित प्रसिद्ध मां वाराही देवी धाम, देवीधुरा में इस वर्ष 2026 की ऐतिहासिक बग्वाल को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं। लोक संस्कृति, अटूट आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं का यह प्रतीक एक बार फिर रक्षाबंधन के पवित्र पर्व पर जीवंत होने जा रहा है।

1. 13 दिवसीय भव्य मेले का आयोजन (23 अगस्त से 4 सितंबर)

देवीधुरा में इस बार बग्वाल मेले का आयोजन 23 अगस्त से 4 सितंबर 2026 तक कुल 13 दिनों के लिए किया जा रहा है। रक्षाबंधन के दिन, यानी 28 अगस्त 2026 को मुख्य आकर्षण 'बग्वाल' का आयोजन प्रसिद्ध खोलीखाड़ दुर्वाचौड़ मैदान में होगा।

सांस्कृतिक झलक: 13 दिनों तक चलने वाले इस मेले में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ उत्तराखंड की विलुप्त होती लोक कलाओं, कुमाऊंनी लोकगीतों, छोलिया नृत्य और स्थानीय हस्तशिल्प का भव्य प्रदर्शन देखने को मिलेगा।

2. चार खामों के रणबांकुरे और खेल की परंपरा

बग्वाल का मुख्य आकर्षण चार पारंपरिक खामों (धड़ों/वंशों) के वीरों के बीच होने वाला यह सांकेतिक युद्ध है:

चार प्रमुख खाम: चम्याल, गहड़वाल, वालिक और लमगड़िया।

पारंपरिक वेशभूषा: चारों खामों के रणबांकुरे अपने-अपने तय रंग के पारंपरिक पगड़ी (साफे) पहनकर मैदान में उतरते हैं।

बचाव के साधन: वीर अपनी रक्षा के लिए बांस और रिंगाल (पहाड़ी बांस) से बनी गोल ढालों, जिन्हें locally 'छतोली' कहा जाता है, का उपयोग करते हैं।

3. पत्थरों से फल-फूलों तक का ऐतिहासिक बदलाव

देवीधुरा की बग्वाल का स्वरूप समय के साथ बदला है, जिसने इसे अधिक सुरक्षित और आकर्षक बना दिया है:

2013 से पहले: सदियों से यह परंपरा पत्थरों से खेली जाती थी, जिसमें कई लोग गंभीर रूप से चोटिल होते थे।

अदालत का फैसला: माननीय उच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के बाद वर्ष 2013 से पत्थरों के प्रयोग पर रोक लगा दी गई।

वर्तमान स्वरूप: अब बग्वाल में पत्थरों की जगह नाशपाती, सेब, और गेंदे के फूलों का इस्तेमाल किया जाता है। फल-फूलों से खेली जाने वाली यह बग्वाल अब पर्यावरण और मानव-हितैषी परंपरा का बेहतरीन उदाहरण बन चुकी है।

4. एक मानव रक्त के बराबर 'रक्त अर्पण' की मान्यता

लोकमान्यता के अनुसार, बग्वाल का खेल तब तक जारी रहता है जब तक कि मां वाराही को एक इंसान के शरीर के बराबर रक्त अर्पित न हो जाए:

खेल के दौरान जब फल या हल्की चोटों से बहने वाला रक्त एक मानव बलि के बराबर मान लिया जाता है, तब माँ वाराही मंदिर के मुख्य पुजारी हाथ में छत्र (छतोली) और घंटी लेकर दुर्वाचौड़ मैदान के बीच में पहुंचते हैं।

पुजारी के संकेत देते ही बग्वाल तुरंत रोक दी जाती है।

सामाजिक सद्भाव: बग्वाल समाप्त होते ही चारों खामों के लोग एक-दूसरे को गले लगाते हैं और पुरानी कड़वाहट भूलकर भाईचारे का संदेश देते हैं।

5. पौराणिक कथा: नरबलि से बग्वाल तक का सफर

देवीधुरा बग्वाल की शुरुआत के पीछे एक भावुक और प्राचीन पौराणिक कथा जुड़ी है:

प्राचीन काल में देवीधुरा के आसपास के क्षेत्र में मां वाराही को प्रसन्न करने के लिए हर साल एक मनुष्य की बलि (नरबलि) दी जाती थी। इसके लिए चारों खामों से बारी-बारी से एक परिवार से व्यक्ति चुना जाता था।

एक बार एक वृद्धा के इकलौते पोते की बलि देने की बारी आई। वृद्धा ने अपने वंश की रक्षा के लिए मां वाराही की कठोर तपस्या की।

मां वाराही ने प्रकट होकर वृद्धा को वरदान दिया और नरबलि की प्रथा समाप्त करने का मार्ग दिखाया। देवी ने कहा कि यदि रक्षाबंधन के दिन चारों खामों के लोग आपस में इस तरह खेलें कि उससे कुल मिलाकर एक मानव के बराबर रक्त बहे, तो वे प्रसन्न रहेंगी। तब से नरबलि की जगह बग्वाल की यह पावन परंपरा शुरू हुई।

उत्तराखंड की यह अनोखी विरासत न केवल हमारी आस्था का केंद्र है, बल्कि यह क्षेत्र के सामाजिक ताने-बाने और आपसी एकता को भी मजबूती प्रदान करती है। हर साल की तरह इस बार भी देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु और पर्यटक इस अद्वैत सांस्कृतिक अनुभव का साक्षी बनने देवीधुरा पहुंच रहे हैं।

Post a Comment

और नया पुराने