अल्मोड़ा जनपद के पांच गांवों में किसान जागरूकता कार्यक्रम आयोजित

भाकृअनुप - विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थावन, अल्मोड़ा द्वारा ‘खेत बचाओ अभियान’ के अंतर्गत अल्मोड़ा जनपद के छानी, पल्यूँ, सुपई, बमनतिलाड़ी तथा चापड़ गांवों में किसान जागरूकता एवं संवाद कार्यक्रम आयोजित किए गए। संस्थान के निदेशक डॉ. लक्ष्मी कांत के समग्र निर्देशन में संपन्न इन कार्यक्रमों में कुल 110 किसानों (46 पुरुष एवं 64 महिलाएं) ने उत्साहपूर्वक प्रतिभाग किया।



विकासखंड भैसियाछाना के छानी, पल्यूँ, सुपई और बमनतिलाड़ी में आयोजित कार्यक्रम में 68 किसानों ने भाग लिया, जिनमें 26 पुरुष और 42 महिलाएं थीं। कार्यक्रम में डॉ. महेन्द्र सिंह भिंडा, डॉ. सुशील कुमार, डॉ. कामिनी बिष्ट एवं डॉ. रवि शंकर ने किसानों को मृदा परीक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग, समेकित पोषक तत्व प्रबंधन, जैव उर्वरकों एवं जैव कीटनाशकों के उपयोग, मल्चिंग, पंक्तियों में बुवाई तथा मिश्रित खेती के बारे में जानकारी दी। किसानों को रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग, जलवायु परिवर्तन और घटती मृदा सेहत जैसी चुनौतियों के बारे में भी बताया गया। किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, किसान क्रेडिट कार्ड तथा मौसम आधारित फसल बीमा योजना जैसी सरकारी पहलों से भी अवगत कराया गया। किसानों को मृदा परीक्षण के आधार पर खाद एवं उर्वरकों का उपयोग करने, जैविक एवं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने, तथा स्थानीय कृषि समस्याओं के समाधान हेतु वैज्ञानिक सुझाव दिए गए। किसानों ने बंदरों और जंगली सूअरों से फसल नुकसान की समस्या प्रमुख रूप से उठाई। 



ताड़ीखेत विकासखंड के चापड़ गांव में आयोजित किसान गोष्ठी में 42 किसानों ने भाग लिया, जिनमें 20 पुरुष और 22 महिलाएं थीं। इस कार्यक्रम का समन्वयन डॉ. आर. पी. मीणा ने किया। किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग, मृदा एवं जल संरक्षण, एल नीनो के वर्षा वितरण पर प्रभाव, समेकित पोषक तत्व प्रबंधन, जल के कुशल उपयोग तथा जलवायु-स्मार्ट कृषि पद्धतियों की जानकारी दी गई। कार्यक्रम के दौरान किसानों ने अनियमित वर्षा, जंगली जानवरों से नुकसान, मृदा उर्वरता तथा गुणवत्तायुक्त बीज उपलब्धता जैसी समस्याएं रखीं। 

इन सभी कार्यक्रमों का उद्देश्य किसानों को टिकाऊ कृषि पद्धतियों, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, जलवायु-स्मार्ट खेती, संतुलित पोषक प्रबंधन तथा विभिन्न सरकारी योजनाओं से जोड़ना था, ताकि पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि को अधिक लाभकारी, वैज्ञानिक और पर्यावरण-अनुकूल बनाया जा सके।

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