इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने लोन गारंटर की जिम्मेदारी को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि लोन की वसूली के लिए बैंक को पहले मुख्य कर्जदार (Borrower) से पूरी रकम वसूलना जरूरी नहीं है, बैंक सीधे गारंटर से भी वसूली की कार्रवाई कर सकता है।
अदालत के फैसले की मुख्य बातें
बराबर की जिम्मेदारी: कोर्ट के मुताबिक गारंटर की देनदारी कानूनी रूप से मुख्य कर्जदार के समान ही होती है।
एक साथ कार्रवाई: बैंक चाहे तो मुख्य कर्जदार और गारंटर दोनों के खिलाफ एक साथ रिकवरी की प्रक्रिया शुरू कर सकता है।
कोई बाध्यता नहीं: बैंक के लिए यह अनिवार्य शर्त नहीं है कि वह पहले मुख्य कर्जदार की संपत्ति नीलाम करे या उससे वसूली की पूरी कोशिश करे और विफल होने पर ही गारंटर के पास पहुंचे।
गारंटर बनने वालों के लिए क्यों है यह बड़ा झटका?
अक्सर लोग सामाजिक संबंधों, रिश्तेदारी या दोस्ती के दबाव में आकर किसी के लोन पेपर पर गारंटर के रूप में हस्ताक्षर कर देते हैं। इस फैसले के बाद गारंटर के लिए जोखिम काफी बढ़ गया है:
सीधा आर्थिक संकट: यदि मुख्य कर्जदार लोन चुकाने में आनाकानी करता है, तो बैंक बिना वक्त गंवाए गारंटर के बैंक खाते या संपत्ति पर कार्रवाई कर सकता है।
सिबिल (CIBIL) स्कोर पर असर: कर्जदार के डिफॉल्ट करते ही गारंटर का क्रेडिट स्कोर भी तुरंत गिर जाएगा, जिससे भविष्य में गारंटर को खुद लोन मिलना मुश्किल हो जाएगा।
लंबी कानूनी लड़ाई: बैंक को पैसे चुकाने के बाद गारंटर को वह रकम मुख्य कर्जदार से वसूलने के लिए खुद अलग से कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने पड़ेंगे।
भविष्य में क्या सावधानी बरतें?
किसी की गारंटी केवल भावनात्मक बहकावे में आकर कभी न दें।
किसी का गारंटर तभी बनें जब आप उस व्यक्ति की नीयत और चुकाने की क्षमता पर 100% आश्वस्त हों।
यह मानकर ही दस्तखत करें कि अगर सामने वाला मुकरा, तो वह पूरा लोन आपको ही भरना पड़ेगा।

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