नई दिल्ली | स्पेशल ब्लॉग
राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर गवाह बना है—उस दर्द का, उस आक्रोश का और उस लाचारी का, जिसे हम इस मुल्क की "युवा शक्ति" कहते हैं।
डिग्रियों की फाइलें हाथ में दबाए, उम्मीदों के भारी बस्ते कंधों पर टांगे और आँखों में आँखों के जलने से बने काले घेरे लिए देश भर से युवा जंतर-मंतर की तपती सड़क पर जमा हैं। माँग क्या है? कोई चाँद-तारे नहीं माँगे जा रहे, बस इतना सा सवाल है—"साहब, हमारी मेहनत का हिसाब कब होगा? भर्ती का विज्ञापन तो आ गया, पर परीक्षा और नियुक्ति का रास्ता किस मोड़ पर खो गया?"
डिग्री तो मिली, पर 'डिप्रेशन' मुफ्त में मिल गया!
युवाओं के चेहरे पढ़िए, वहाँ आपको देश का असली 'रिपोर्ट कार्ड' दिखेगा।
सालों-साल कोचिंग की सीलन भरी कोठरियों में भूखे पेट काटना।
माँ-बाप के कर्ज़ पर चलती पढ़ाई और हर दिन गिरता मनोबल।
फॉर्म भरने के हज़ारों रुपये का इंतज़ाम और फिर पेपर लीक होने या रद्द होने का अंतहीन सिलसिला।
एक प्रदर्शनकारी छात्र की आँखों में आँसू और सीने में गुस्सा था, उसने कहा: "घर वाले पूछते हैं कि नौकरी कब लगेगी, अब उन्हें कैसे बताएँ कि हमारी जवानी परीक्षाओं के कैलेंडर का इंतज़ार करते-करते गुज़र रही है!"
सरकार का 'विकास मॉडल': पकौड़े से लेकर पेपर लीक तक!
अब ज़रा हुक्मरानों के उस ठंडे रवैये पर भी नज़र डाल लीजिए जो इन नारों के बीच अपनी गद्देदार कुर्सियों पर आश्वस्त बैठे हैं।
तंज नहीं तो और क्या है?
जब चुनाव आते हैं, तो रैलियों से युवाओं पर वादों की बारिश कर दी जाती है। लेकिन जब वही युवा अपने हक के लिए दिल्ली की सड़कों पर आता है, तो सरकार का 'सहानुभूति स्विच' अचानक ऑफ हो जाता है।
डिजिटल इंडिया की क्रांति: डिजिटल इंडिया में फॉर्म तो एक क्लिक पर भर जाता है, लेकिन भर्ती का रिजल्ट आने में दशकों का 'एनालॉग सिस्टम' लग जाता है।
पेपर लीक या भविष्य लीक? हर दूसरी परीक्षा के बाद 'जांच कमेटी' बिठा देना ही शायद अब सरकार की सबसे बड़ी 'रोजगार योजना' बन चुकी है।
अजीब विरोधाभास: जब मुल्क में 'विश्वगुरु' बनने के ढोल पीटे जा रहे हों, तब देश का सबसे योग्य और पढ़ा-लिखा तबका सड़कों पर पुलिस की लाठियों और पानी की बौछारों के बीच अपने हक की भीख माँग रहा है।
कागज़ों की 'फाइल' और वादों का 'गुब्बारा'
सरकार को यह समझना होगा कि जंतर-मंतर पर जमा यह भीड़ महज़ कुछ हज़ार युवाओं की नहीं है। यह उन लाखों परिवारों की टूटती आस है जिन्होंने अपने बच्चों की तालीम के लिए अपनी जमापूँजी दाँव पर लगा दी है।
अगर देश की ऊर्जा को सड़कों पर ही सुखाना है, तो फिर 'युवा भारत' का नारा किस काम का? कागज़ों में जीडीपी (GDP) के आँकड़े चमकाना आसान है साहब, लेकिन सड़कों पर बिखरे इन नौजवानों के आंसुओं का हिसाब कौन देगा?
चलते-चलते एक सवाल आपके लिए:
क्या हमारे लोकतंत्र में युवाओं की आवाज़ सिर्फ वोट डालने तक ही कीमती है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें और इस आवाज़ को शेयर करें!

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