'हरेला' का शाब्दिक अर्थ होता है 'हरे रंग का दिन' या 'हरियाली'। यह पर्व नई फसलों के आगमन, खुशहाली और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है।
9 या 11 दिन पहले बोया जाता है तिनका (हरेला)
हरेला पर्व की तैयारियां मुख्य त्योहार से 9 या 11 दिन पहले ही शुरू हो जाती हैं।
आषाढ़ के महीने में घरों के मंदिरों में टोकरियों के अंदर मिट्टी डालकर 5, 7 या 9 प्रकार के अनाज (जैसे- गेहूं, जूं, मक्का, गहत, सरसों, उड़द आदि) बोए जाते हैं।
इन बोए गए अनाजों को नौ दिनों तक सूर्य की रोशनी से दूर रखा जाता है और रोज़ाना पानी दिया जाता है, जिससे इनका रंग हल्का पीला-हरा हो जाता है।
आज (16 जुलाई) के दिन इस पावन 'हरेला' को काटा जाता है और देवताओं को अर्पित करने के बाद घर के बुजुर्ग इसे परिवार के सभी सदस्यों के सिर और कानों पर रखकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
आशीर्वाद का पारंपरिक मंत्र
हरेला पूजते समय कुमाऊं क्षेत्र में बुजुर्ग यह पारंपरिक आशीर्वाद देते हैं:
"जी रया, जागी रया, यो दिन बार-बार भेटने रया...
दूब जस पनपिया, स्यू जस तराण हो...
हरेला की शुभकमनाएं!"
(इसका अर्थ है: जीते रहो, जागरूक रहो, यह दिन बार-बार देखने को मिले। दूब घास की तरह फैलते रहो और शेर जैसी ताकत बनी रहे।)
पर्यावरण संरक्षण और पौधारोपण का महापर्व
आज के दौर में जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है, उत्तराखंड का हरेला पर्व पर्यावरण बचाने की राह दिखाता है।
पौधारोपण का संकल्प: आज के दिन उत्तराखंड में व्यापक स्तर पर पौधारोपण अभियान चलाया जाता है। लोग अपने खेतों, आंगनों और खाली जगहों पर फलदार और छायादार पेड़ लगाते हैं।
शिव-पार्वती विवाह का प्रतीक: इस दिन को भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के रूप में भी मनाया जाता है। कुमाऊं के कई हिस्सों में मिट्टी के डिकारे (मूर्तियां) बनाकर भगवान शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है।
प्रकृति को सहेजने का संदेश
हरेला पर्व हमें याद दिलाता है कि हमारा अस्तित्व इस प्रकृति और हरियाली से ही है। आज के दिन पवित्र नदियों में स्नान (जैसे हरिद्वार के हर की पौड़ी पर विशेष स्नान) करने और प्रकृति की पूजा करने का विशेष महत्व है। आइए, इस पावन पर्व पर हम सब मिलकर कम से कम एक पौधा लगाने का संकल्प लें और अपनी धरती को हरा-भरा बनाएं।
आप सभी पाठकों को हरेला पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं!
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