अल्मोड़ा (उत्तराखंड)।
उत्तराखंड को अलग राज्य बने दो दशक से ज्यादा का समय बीत चुका है। सरकारें आईं, गईं और पहाड़ों के विकास के बड़े-बड़े दावे किए गए। लेकिन जमीनी हकीकत आज भी बेहद डरावनी और निराश करने वाली है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है अल्मोड़ा जिले के भैसियाछाना विकासखंड के अंतर्गत आने वाली खाकरी ग्राम सभा का तिमूरी गांव। इस गांव के ग्रामीणों को राज्य बनने के बाद आज तक एक अदद पक्की सड़क नसीब नहीं हुई है।
फाइलों में कैद 'कषाण बैंड से अगेरा तिमूरी सड़क मार्ग'
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, 'कषाण बैंड से अगेरा तिमूरी सड़क मार्ग' को तत्कालीन सरकार के समय ही प्रशासनिक स्वीकृति मिल गई थी। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि इस सड़क मार्ग की फाइल आज तक विभागीय दफ्तरों और लालफीताशाही (Bureaucracy) के चक्करों से बाहर नहीं निकल पाई है। नेता आते हैं, चुनाव में वादे करते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही विकास की फाइलें बंद अलमारियों में डाल दी जाती हैं।
बरसात में जान जोखिम में डालने को मजबूर ग्रामीण
सड़क न होने के कारण आज भी यहाँ के लोग सदियों पुरानी पगडंडियों (कच्चे रास्तों) के सहारे जी रहे हैं।
- चढ़ाई और ढलान का खतरनाक सफर: निकटतम बाजार या अस्पताल जाने के लिए ग्रामीणों को भारी चढ़ाई और ढलान वाले खतरनाक रास्तों से गुजरना पड़ता है।
- बरसात का मौसम यानी मौत को दावत: मॉनसून और बरसात के सीजन में ये पगडंडियाँ पूरी तरह फिसलने वाली और जानलेवा हो जाती हैं। बीमारों और गर्भवती महिलाओं को पीठ या डोली पर लादकर मुख्य सड़क तक पहुँचाना यहाँ रोज़ की अग्निपरीक्षा है।
केवल तिमूरी नहीं, पूरा रीठागाड़ क्षेत्र है बदहाल
इस गंभीर मुद्दे पर रीठागाड़ी दगड़ियों संघर्ष समिति के अध्यक्ष प्रताप सिंह नेगी ने तीखी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने बताया, "यह समस्या सिर्फ किसी एक तिमूरी गांव की नहीं है। बल्कि पूरे रीठागाड़ क्षेत्र के कई गांव आज भी सड़क, बिजली, पानी और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की बदहाली से जूझ रहे हैं।"
प्रताप सिंह नेगी का कहना है कि सरकारों की इसी बेरुखी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण गांव के गांव खाली हो रहे हैं। उत्तराखंड के पहाड़ों में 'पलायन की रफ्तार' थामने के सरकारी दावे यहाँ आकर पूरी तरह खोखले साबित होते हैं।
हमारा नजरिया (Conclusion / Opinion):
यदि सरकारें सच में उत्तराखंड के पहाड़ों को बचाना चाहती हैं और 'पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी' को यहीं रोकना चाहती हैं, तो तिमूरी जैसे सैकड़ों गांवों तक तुरंत सड़क पहुँचानी होगी। अगेरा-तिमूरी सड़क मार्ग को फाइलों से निकालकर धरातल पर लाना अब शासन-प्रशासन के लिए साख का सवाल होना चाहिए।
आपकी क्या राय है? क्या डिजिटल इंडिया और हाई-टेक रोड्स के इस दौर में हमारे पहाड़ों के गांवों का इस तरह सड़क के लिए तरसना सही है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर साझा करें और इस पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर करें ताकि यह आवाज प्रशासन तक पहुँच सके।
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