अल्मोड़ा
भाकृअनुप–विवेकानन्दस पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थायन, अल्मोड़ा द्वारा संस्थान के निदेशक डॉ. लक्ष्मी कांत के मार्गदर्शन में चल रहे “खेत बचाओ अभियान” के अंतर्गत नैनीताल जनपद के सूपी, काफली, कसियालेक और बना गांवों तथा अल्मोड़ा के भिकियासैंण क्षेत्र के लौकोट गांव में किसान जागरूकता एवं क्षमता विकास कार्यक्रम आयोजित किए गए। इन कार्यक्रमों में कुल 100 किसानों ने सक्रिय भागीदारी निभाई, जिनमें 59 पुरुष और 41 महिला किसान सम्मलित रहे।
इन कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य किसानों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग, जैविक एवं प्राकृतिक खेती, समेकित पोषक तत्व प्रबंधन तथा टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक करना था। संस्थान के वैज्ञानिकों ने किसानों को नियमित मृदा परीक्षण, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, जैविक पदार्थों के उपयोग और रासायनिक उर्वरकों के संतुलित प्रयोग के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
इस अवसर पर कृषकों को फसल बीमा, किसान क्रेडिट कार्ड, पीएम-किसान सम्मान निधि, कृषि यंत्रीकरण सहायता और गुणवत्तायुक्त कृषि आदानों की उपलब्धता जैसी विभिन्न सरकारी योजनाओं की जानकारी दी गई। साथ ही, उन्नत किस्मों, दलहनी फसलों के प्रसार, सब्जी एवं उद्यान फसलों की वैज्ञानिक खेती तथा पर्वतीय क्षेत्रों के लिए उपयुक्त वैकल्पिक फसलों पर भी विशेष चर्चा की गई। स्थानीय आवश्यकताओं को देखते हुए, कसियालेक के कार्यक्रम में किसानों को हल्दी, अदरक और हींग जैसी फसलों के बारे में बताया गया, जिन्हें जंगली जानवरों से अपेक्षाकृत कम नुकसान होता है। वहीं लौकोट में जल संरक्षण, फसल अवशेष प्रबंधन, समेकित कृषि प्रणाली और जलवायु-सहिष्णु कृषि पर बल दिया गया। बना गांव में राजमा, सब्जी मटर और बीन के माध्यम से फसल विविधीकरण तथा आयवृद्धि के उपायों पर चर्चा की गई।
कार्यक्रम के दौरान किसानों ने बंदर, जंगली सूअर, कुरमुला कीट तथा ओलावृष्टि से फसलों की क्षति जैसी प्रमुख चुनौतियां साझा कीं। साथ ही, कृषि निवेशों की समय पर उपलब्धता की मांग भी रखी। वैज्ञानिकों की टीम ने इन विषयों पर संवाद कर किसानों को व्यावहारिक समाधान और कम लागत वाली लाभकारी खेती अपनाने का आह्वान किया। इन कार्यक्रमों का संचालन भाकृअनुप–वी.पी.के.ए.एस., अल्मोड़ा की वैज्ञानिक टीम, जिसमें डॉ. निर्मल हेड़ाऊ, डॉ. अशोक कुमार, डॉ. दिनेश चंद्र जोशी, डॉ. जय प्रकाश आदित्य और डॉ. महेंद्र भिंडा शामिल थे, द्वारा किया गया। इन आयोजनों में किसानों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया तथा वैज्ञानिकों के साथ संवाद कर अपनी समस्याओं के वैज्ञानिक समाधान प्राप्त किए।
