खेती बचाओ अभियान’ के अंतर्गत पर्वतीय कृषकों के लिए जागरूकता कार्यक्रमों का सफल आयोजन



भारत सरकार के राष्ट्रव्यापी “खेती बचाओ अभियान” दिनांक 1 से 30 जून 2026 के अन्‍तर्गत भाकृअनुप-विवेकानन्‍द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्‍थान, अल्मोड़ा के निदेशक डॉ. लक्ष्मी कान्त के मार्गदर्शन में संस्‍थान के वैज्ञानिकों द्वारा जनपद अल्मोड़ा और बागेश्वर के चार गांवों—मैठानी (ब्लॉक सल्ट, अल्मोड़ा) तथा भटखोला, नडीला एवं बिनसर (बागेश्वर)—में किसान जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इन कार्यक्रमों में कुल 63 किसानों ने उत्साहपूर्वक भागीदारी की।


ग्राम मैठानी में आयोजित कार्यक्रम में 11 महिलाओं सहित 25 किसानों ने भाग लिया। विशेषज्ञों ने मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, संतुलित उर्वरक प्रयोग और जलवायु-सहनशील कृषि तकनीकों पर विस्तार से चर्चा की। किसानों को रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग के दुष्प्रभावों के प्रति सचेत करते हुए मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन को अपनाने का परामर्श दिया गया। साथ ही, जैविक एवं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने हेतु गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट और जैव उर्वरकों के वैज्ञानिक उपयोग पर विशेष जोर दिया गया। किसानों ने बंदर, जंगली सूअर, कुरमुला कीट तथा मिर्च की विल्ट एवं एफिड जैसी समस्याओं को साझा किया, जिनका विशेषज्ञों द्वारा तकनीकी समाधान सुझाया गया।


बागेश्वर जिले के भटखोला, नडीला और बिनसर गांवों में आयोजित कार्यक्रमों में 6 महिलाओं सहित 38 किसानों ने भाग लिया। यहाँ विशेषज्ञों ने कच्ची गोबर की खाद के उपयोग से होने वाली कुरमुला की समस्या के वैज्ञानिक कारणों को समझाया और समाधान के रूप में वी.एल. लाइट ट्रैप, अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद और बेसिलस सीरियस आधारित जैव-कीटनाशी प्रक्षेत्र फॉर्म्युलेशन के उपयोग का सुझाव दिया। इसके अतिरिक्त, “खेत का पानी खेत में, खेत की मिट्टी खेत में” के मूल मंत्र के साथ मृदा एवं जल संरक्षण हेतु स्थानीय स्तर पर संसाधन प्रबंधन की आवश्यकता पर बल दिया गया।


इन आयोजनों ने किसानों को न केवल वैज्ञानिक तकनीकें सीखने का अवसर दिया, बल्कि उन्हें अपनी कृषि समस्याओं पर सीधे विशेषज्ञों से परामर्श करने का एक मंच भी प्रदान किया। यह पहल पर्वतीय क्षेत्रों में टिकाऊ और संसाधन-संरक्षण आधारित कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने में मील का पत्थर साबित होगी। इन कार्यक्रमों का संचालन एवं समन्वयन संस्थान के वैज्ञानिकों—डॉ. पंकज कुमार मिश्रा, डॉ. गौरव वर्मा, डॉ. कृष्ण कांत मिश्रा, डॉ. अमित कुमार तथा डॉ. राजेंद्र मीणा द्वारा किया गया।

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