कृष्ण जन्माष्टमी 2026: जानिए क्यों मनाया जाता है यह पावन पर्व, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

 


वेब डेस्क, अल्मोड़ा: सनातन धर्म के सबसे प्रमुख त्योहारों में से एक, श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व देशभर में बड़े ही धूमधाम और अपार श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है।

अधर्म पर धर्म की विजय के प्रतीक इस पर्व को लेकर मंदिरों और घरों में विशेष तैयारियां की जा रही हैं। आइए जानते हैं जन्माष्टमी का पौराणिक महत्व, पूजा का शुभ मुहूर्त और इस पर्व से जुड़ी मान्यताएं।

क्यों मनाई जाती है कृष्ण जन्माष्टमी?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में मथुरा नगरी पर अत्याचारी राजा कंस का शासन था। कंस के बढ़ते पापों और प्रजा पर हो रहे अत्याचारों को समाप्त करने के लिए भगवान विष्णु ने देवकी के गर्भ से आठवें पुत्र के रूप में श्री कृष्ण का अवतार लिया।

आकाशवाणी हुई थी कि देवकी का आठवां पुत्र ही कंस का वध करेगा। कंस ने बचने के लिए देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया था। भाद्रपद अष्टमी की घनघोर तूफानी रात को जब आधी रात में श्री कृष्ण का जन्म हुआ, तब चमत्कारिक रूप से कारागार के ताले टूट गए और वसुदेव जी बाल-कृष्ण को सुरक्षित गोकुल में नंद बाबा के घर छोड़ आए। गोकुल में पले-बढ़े श्री कृष्ण ने आगे चलकर अत्याचारी कंस का अंत किया।

जन्माष्टमी 2026: तिथि और पूजा का शुभ मुहूर्त

इस वर्ष जन्माष्टमी की तिथि और पूजन समय को लेकर विशेष योग बन रहा है:

अष्टमी तिथि का प्रारंभ: 4 सितंबर 2026 (तड़के 02:25 बजे से)

अष्टमी तिथि का समापन: 5 सितंबर 2026 (रात 12:13 बजे तक)

मध्यरात्रि (निशिता काल) पूजा का समय: 4 सितंबर की रात 11:57 बजे से मध्यरात्रि 12:43 बजे (5 सितंबर) तक

दही हांडी व नंदोत्सव: 5 सितंबर 2026

भगवान कृष्ण का जन्म मध्यरात्रि (रात 12 बजे) हुआ था, इसलिए मुख्य व्रत और जन्मोत्सव की पूजा 4 सितंबर की रात को ही संपन्न होगी।

जन्माष्टमी का धार्मिक महत्व

अधर्म पर धर्म की जीत: यह त्योहार संदेश देता है कि जब-जब धरती पर अत्याचार बढ़ता है, तब-तब ईश्वर सत्य और धर्म की रक्षा के लिए प्रकट होते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान: श्री कृष्ण ने महाभारत युद्ध के दौरान अर्जुन को कर्मयोग का उपदेश दिया था, जो आज भी मानव जीवन के लिए सबसे बड़ा मार्गदर्शन है।

प्रेम और वात्सल्य: बाल-गोपाल की लीलाएं और माखन चोरी के प्रसंग जीवन में आनंद और भक्ति का संचार करते हैं।

कैसे मनाई जाती है जन्माष्टमी?

जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालु दिनभर उपवास रखते हैं। रात्रि 12 बजे मंदिरों और घरों में ढोल-नगाड़ों और शंखध्वनि के साथ लड्डू गोपाल का जन्मोत्सव मनाया जाता है। भगवान को पंचामृत से स्नान कराकर माखन-मिश्री का भोग लगाया जाता है। अगले दिन देशभर में 'नंदोत्सव' और 'दही-हांडी' (मटकी फोड़) प्रतियोगिताओं का भव्य आयोजन किया जाता है।

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