विश्व साहित्य में बहुत कम ऐसे रचनाकार हुए हैं जिन्होंने मृत्यु को भय के रूप में नहीं, बल्कि एक आत्मीय उत्सव की तरह जिया। उत्तराखंड की वादियों से निकले 'हिमवंत कवि' चंद्रकुंवर बर्त्वाल (20 अगस्त 1919 – 14 सितंबर 1947) एक ऐसी ही विलक्षण आत्मा थे, जिन्होंने महज 28 वर्ष की अल्पायु में हिंदी साहित्य को कालजयी निधि सौंपी।
प्रकृति की गोद से काव्य यात्रा का आरंभ
रुद्रप्रयाग के मालकोटी गाँव में जन्मे बालक कुंवर सिंह ने मात्र 13 वर्ष की उम्र में नागनाथ के बर्फीले माहौल और बाँज-बुरांश के सौंदर्य से प्रेरित होकर अपनी पहली कविता लिखी:
> ये बाँज बुराँश पुराने पर्वत से,
> यह हिम से ठंडा पानी...
> पीले फूलों में कांप रही
> पर्वत की जीर्ण जवानी
>
पौड़ी में शिक्षा के दौरान वे हिमालय की भव्यता के उपासक बने। उनकी रचनाओं में बादल, बारिश, नदियों और पहाड़ी जनजीवन के मनमोहक चित्र जीवंत हो उठते हैं।
क्षय रोग का दंश और पंवालिया का एकांतवास
मात्र 19 वर्ष की आयु में कवि तपेदिक (टीबी) की चपेट में आ गए। बीमारी के संक्रमण के डर से जीवन के अंतिम वर्षों (1945-1947) में उन्हें पंवालिया में एकाकी जीवन बिताने पर मजबूर होना पड़ा। अपनों से ही दूर हो जाने की व्यथा उन्होंने यूँ लिखी:
> अपने ही द्वारों के आगे भिक्षुक बनकर
> खड़ा हुआ मैं अपनी आंखों में आँसू भर
> मुझे देख कोई न निकलता अब हंस बाहर...
>
मृत्यु के द्वार पर यम का सहर्ष स्वागत
जहाँ मौत की आहट इंसान को नैराश्य से भर देती है, वहीं बर्त्वाल जी ने यमराज का स्वागत एक पुराने मित्र की तरह किया। वे निराशा के घोर तिमिर में भी दिव्य आशा के कवि बने रहे:
> बैठ मृत्यु के द्वारों पर भीषण निश्चय से
> मैं गाता हूँ यम का यश वैवस्वत यम का...
> आ गई है मृत्यु इसको लूँ हँसकर रो-रो कर!
>
अतुलनीय साहित्यिक विरासत
8 वर्ष तक असाध्य बीमारी से जूझते हुए उन्होंने 750 से अधिक कविताएँ और 25 से अधिक कहानियाँ रचीं।
* गीत माधवी व नंदिनी: उनकी मृत्यु के बाद उनके अभिन्न मित्र शंभू प्रसाद बहुगुणा के निष्ठावान प्रयासों से उनकी अमर रचनाएँ प्रकाश में आईं।
* अद्वितीय दृष्टिकोण: छायावाद के दौर में मृत्यु पर इतना विस्तृत, भयमुक्त और उल्लासपूर्ण साहित्य लिखने वाले वे अकेले कवि हैं।
* शाश्वत संदेश: उनका मानना था कि शरीर भले ही क्षीण हो जाए, लेकिन जीवन का आनंद और आशा कभी समाप्त नहीं होती।
चंद्रकुंवर बर्त्वाल का साहित्य आज भी अपने पूर्ण और सही मूल्यांकन की प्रतीक्षा कर रहा है, ताकि इस उपेक्षित हीरे को हिंदी साहित्य के गगन में उनका न्यायसंगत स्थान मिल सके।
(मूल आलेख: हेमंत चौकियाल, वरिष्ठ शिक्षक
एवं साहित्यकार, रुद्रप्रयाग)

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